मातृभाषा को भूलना राष्ट्रभाषा को भूलने के बराबर: हिन्दी दिवस पर साहित्यकारों और पत्रकारों का सम्मान

DNB Bharat Desk

मातृभाषा को भूलना राष्ट्रभाषा को भूलने के बराबर है। देश में बढ़ते औपनिवेशिक मानसिकता के कारण ही हिन्दी को आगे बढ़ने में सबसे बड़ी बाधा है। हिन्दी दिवस पर हिन्दी साहित्य अकादमी की ओर से  आयोजित कार्यक्रम में ललित नारायण विश्वविद्यालय दरभंगा के पूर्व अधिकारी डॉ चन्द्रभानु प्रसाद सिंह ने उक्त बातें कहते हुए बताया कि आधुनिक दौर में संकेत ही भाषा बनती जा रही है।

हम मैसेज लिखने से बेहतर इमोजी डालकर अपनी संवेदना प्रकट करते हैं। यह हिन्दी भाषा की मजबूती है कि संकेत के भाषा में भी यह साथ रहती है। उन्होनें कहा कि उर्दू को धर्म के आधार पर लोग नहीं दूर करते जा रहे हैं जबकि यह शुद्ध भारतीय भाषा है। मौके पर पूर्व विधायक एवं प्रलेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेनद्र राजन ने कहा कि भाषा फासले मिटाने के लिए होती है। इसलिए ही महात्मा गांधी औश्र सुभाष चन्द्र बोस ने कहा कि हिन्दी भाषा को बढ़ाने से ही भारतीए एकजुट हो सकते हैं।

मातृभाषा को भूलना राष्ट्रभाषा को भूलने के बराबर: हिन्दी दिवस पर साहित्यकारों और पत्रकारों का सम्मान 2कर्मचारी भवन में आयोजित हिन्दी दिवस पर पूर्व प्रधानाचार्या डॉ स्वपना चौधरी ने कहा कि वे भले ही विज्ञान के छात्र और शिक्षक रहे हों, लेकिन उन्हें हिन्दी से लगाव रही है। मौके पर साहित्यकारों, पत्रकारों और रंगकर्मी कलाकारों को सम्मानित किया गया।

हिन्दी दिवस के मौके पर हिन्दी को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले रचनाकारों में डॉ भगवान प्रसाद सिन्हा, राम कृष्ण, विद्यासागर ब्रह्मचारी, मुकेश कुमार, डॉ प्रभा कुमारी एवं कवयित्री सुनीता झा को सम्मानित किया गया। इसी तरह पत्रकार के रूप में अशोक कुमार और विजय कुमार झा को तथा रंगकर्मी के रूप में मेनका मल्लिक को प्रसस्ति पत्र और अंगवस्त्र देकर सम्मानित किया गया।

मातृभाषा को भूलना राष्ट्रभाषा को भूलने के बराबर: हिन्दी दिवस पर साहित्यकारों और पत्रकारों का सम्मान 3कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ सीताराम प्रभंजन ने की जबकि मंच संचालन डॉ सच्चितानंद पाठक ने किया। मौके पर नरेन्द्र कुमार, प्रलेस के जिला सचिव राजकिशोर सिंह, रामकुमार, अग्नि शेखर, सुरेश प्रसाद सिंह, राजेन्द्र सिंह सहित कइ्र लोग मौजूद थे।

Share This Article