संत एवं शास्त्र दोनों गुरु को ही कर्णधार बताते हैं- प्रेम शरण

DNB Bharat Desk

डीएनबी भारत डेस्क

जीवन एक समुद्र यात्रा है अगाध जल राशि, उत्ताल तरंगें और दुर्लभ नौका के सहारे संसार रूपी सागर से पार जाना है। ऐसे में कुशल कर्णधार (खेवैया) मिल जाए तो डूबने की आशंका निवृत्त हो जाती है संत एवं शास्त्र दोनों गुरु को ही कर्णधार बताते हैं।

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 उक्त बातें गुरु पूर्णिमा के मौके पर बुधवार को श्री गंगा मुक्ति पीठ सिमरिया धाम के महंत श्री किशोरी शरण के शिष्य आचार्य श्री प्रेम शरण जी महाराज ने कही। उन्होंने कहा कि श्रीमद् भागवत महापुराण के अनुसार मानव शरीर दुर्लभ नाव है। भगवत कृपा अनुकूल वायु है। गुरु इस नाव के खेवनहर है। इस दुर्लभ संयोग का सहारा लेकर भव सागर से पर होना ही जीवन का परम लक्ष्य है।

संत एवं शास्त्र दोनों गुरु को ही कर्णधार बताते हैं- प्रेम शरण 2आर्ष परम्परा में बोध का श्रेय गुरू को ही जाता है। कहा कि संसार में, दैहिक, दैविक, भौतिक तीनों प्रकार के रोगो से व्यक्ति कहीं न कहीं अवश्य पिड़ित है और इस पीड़ा का निदान वह संसार में खोजने की महती भूल निरंतर किए जा रहा है जबकि इसका समाधान केवल सच्चे गुरु के ही पास संभव है अतः सम्पूर्ण श्रद्धा एवं समर्पण के साथ गुरु चरणों में जाना ही श्रेयस्कर है।

बेगूसराय बीहट संवाददाता धरमवीर कुमार की रिपोर्ट

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