भौगोलिक चुनौती और संसाधनों का अभाव: रेलवे गुमटी और दियारे के जाल में उलझी डायल 112, ग्रामीणों ने की बछवाड़ा में 3 अलग-अलग टीमों की मांग
डीएनबी भारत डेस्क
आम लोगो को संकट के समय तुरंत पुलिस सहायता और राहत उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शुरू की गई बिहार सरकार की महत्वाकांक्षी योजना डायल 112 बछवाड़ा प्रखंड में संसाधनों की घोर कमी और जटिल भौगोलिक बनावट के कारण दम तोड़ती नजर आ रही है। कुल 19 पंचायतों में में फैले इस थाना क्षेत्र की करीब दो से ढाई लाख आबादी की सुरक्षा और आपातकालीन मदद का जिम्मा सिर्फ एक ही डायल 112 टीम पर आ टिका है। नतीजा किसी भी बड़ी घटना, सड़क दुर्घटना या आपराधिक वारदात के समय जब पीड़ित मदद की गुहार लगाते हैं, तो पुलिस टीम को मौके पर पहुंचने में घंटों लग जाते हैं।

स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार बछवाड़ा थाना क्षेत्र में पहले डायल 112 की दो गाड़ियां लगातार गश्त पर तैनात रहती थीं। उस दौरान क्षेत्र में किसी भी आपात स्थिति की सूचना मिलते ही पुलिस महज 10 से 15 मिनट के भीतर घटनास्थल पर पहुंच जाती थी, जिससे आम लोगों को काफी राहत मिलती थी। लेकिन करीब छह माह पूर्व एक सड़क दुर्घटना में 112 की एक गाड़ी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई। विडंबना यह है कि आधा साल बीत जाने के बाद भी पुलिस विभाग और वरीय प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा यहां दूसरी वैकल्पिक गाड़ी उपलब्ध नहीं कराई गई। अब पूरी 19 पंचायतों का भारी-भरकम बोझ एकमात्र वाहन और उस पर तैनात सीमित पुलिसकर्मियों पर आ गया है।
सबसे विकट स्थिति तब उत्पन्न होती है जब एक ही समय पर थाना क्षेत्र के दो अलग-अलग छोरों से आपातकालीन सूचनाएं आ जाती हैं। ऐसी स्थिति में 112 की टीम भारी असमंजस में पड़ जाती है कि पहले किस पीड़ित की मदद के लिए निकला जाए। प्राथमिकता तय करने के इस फेर में कई बार गंभीर मामलों में भी पुलिस बहुत देर से पहुंचती है, जिससे विवाद बढ़ जाता है या घायलों को समय पर अस्पताल पहुंचाने में देरी हो जाती है। बछवाड़ा की भौगोलिक बनावट बेहद जटिल है और यह इलाका मुख्य रूप से तीन अलग-अलग हिस्सों में बंटा हुआ है। पहली सबसे बड़ी समस्या इलाके के बीचों-बीच से गुजरने वाली व्यस्त रेलवे लाइन है। रेल लाइन के उस पार अरवा, कादराबाद, भिखमचक, बछवाड़ा और बहरामपुर जैसी महत्वपूर्ण पंचायतें स्थित हैं। इस रूट पर चौबीसों घंटे ट्रेनों की भारी आवाजाही रहती है, जिसके कारण रेलवे गुमटी एक बार में 40 से 45 मिनट तक बंद रहती है। कई बार लगातार तीन से चार ट्रेनों के गुजरने के बाद ही फाटक खुलता है। ऐसे में यदि 112 की गाड़ी लाइन के इस पार है और घटना रेलवे पार वाले इलाके में घटती है, तो पुलिस टीम चाहकर भी समय पर नहीं पहुंच पाती और रेलवे गुमटी पर फंसी रह जाती है।
दूसरी बड़ी चुनौती गंगा नदी से सटा दियारा इलाका है। प्रखंड की पांच पंचायतें-चमथा-1, चमथा-2, चमथा-3, विशनपुर और दादुपुर पंचायत पूरी तरह दियारे में स्थित हैं। बछवाड़ा थाना मुख्यालय से चमथा की दूरी करीब 10 से 12 किलोमीटर है। यहां के रास्ते बेहद ख़राब हैं। दियारे के किसी गांव में गोलीबारी, मारपीट या जमीन विवाद जैसी अप्रिय घटना होने पर 112 की टीम को पहुंचने में कम से कम एक से सवा घंटे का समय लग जाता है। तब तक स्थिति अनियंत्रित हो चुकी होती है। वहीं दूसरी ओर एनएच 28 सड़क के किनारे स्थित रानी-1, रानी-2, रानी-3, गोधना ,गोविंदपुर-3, फतेहा, चिरंजीवीपुर और रसीदपुर पंचायतों में दूरी के कारण वाहन को पहुंचने में आधा घंटा लग जाता है। स्थानीय निवासी उमेश कुंवर कवि, समाजसेवी विजय शंकर दास,श्याम प्रसाद दास,अशोक यादव समेत कई ग्रामीणों का कहना है कि आज के समय में जमीनी स्तर पर आम लोगों का भरोसा स्थानीय थाने की तुलना में डायल 112′ की टीम पर कहीं अधिक है। गांव-देहात में किसी भी प्रकार का विवाद, मारपीट, घरेलू हिंसा, छिनतई या सड़क हादसा होने पर लोग सीधे 112 पर कॉल करना अधिक सुरक्षित और प्रभावी मानते हैं।
लोगों का मानना है कि 112 की टीम बिना किसी टालमटोल के तुरंत कार्रवाई करती है। लेकिन एक ही वाहन होने के कारण जब घंटों तक गाड़ी नहीं पहुंचती, तो लोगों का यह भरोसा टूटने लगता है। क्षेत्र के बढ़ते अपराध और भौगोलिक विषमताओं को देखते हुए बछवाड़ा के ग्रामीणों और समाजसेवियों ने उच्चाधिकारियों से मांग की है कि बछवाड़ा थाना को तुरंत कम से कम 3 अलग-अलग 112 टीमें और वाहन उपलब्ध कराए जाएं। ग्रामीणों का सुझाव है कि एक टीम को रेलवे लाइन के इस पार, दूसरी टीम को रेलवे लाइन के उस पार और तीसरी टीम को स्थायी रूप से चमथा समेत संपूर्ण दियारा क्षेत्र के लिए तैनात किया जाए। ऐसा होने से रेलवे फाटक बंद होने की स्थिति में भी राहत कार्य बाधित नहीं होगा और दियारे के सुदूर इलाकों में भी तुरंत मदद पहुंच सकेगी। यदि प्रशासन ने समय रहते इस गंभीर समस्या का समाधान नहीं निकाला, तो आपातकालीन सेवा का होना न होना बराबर साबित होगा।
डीएनबी भारत डेस्क